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Do you believe in Angels?

                                                             एक गुमनाम परी

कुछ सालों पहले रामलीला मैदान से खरीदा था मुकुट, धनुष, परी की छड़ी..परी बनकर भी गुमनाम हूं मैं...मेरी डायरी एक बिखरा पन्ना आपकी नज़र कर रही हूं...

ये जो Facebook ID है न?
ये कोई पहचान नहीं मेरी,
बस एक मकां है, फ़क़त,
गुमनामियों का एक मकाँ...
जिसकी खिड़की पे बैठ कर
मैं, लिखती रहती हूँ तुम्हारे नाम कई कई खत ...
और छोड़ देती हूँ ...इस अजनबी मोहल्ले में ...
कि कभी आओ अगर इस गली,
तो पढ़ना इन खतों को...
मेरी आँखों की तरह,
इनमें भी अपना ही अक्स पाओगे...

मेरे पास,
तुम्हारा पता तो नहीं... मगर....
अपने निशां ज़रूर बचा रखे हैं...
मैंने तुम्हारे लिए...


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खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..

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