Skip to main content

सोलहवां साल मुबारक


मुबारक हो दोस्तों..आखिर वो साल आ ही गया जिसने हम सबको एक बार फिर से सोलह साल का बना दिया..ट्वेंटी-सिक्सटीन(2016) का एक मतलब ये भी है कि जितने भी 20 साल से ज्यादा उम्र के लोग हैं वो अपने आप को 16 साल का महसूस करना शुरू कर दें..ये उम्र का एक ऐसा जादुई साल है जब ना कोई डर होता है और ना ही कोई गम..होते हैं तो बस अनगिनत सपने और फौलादी इरादे..दुनिया को फतह करने के..सोलहवें साल के इसी जोश और जुनून के साथ क्यों ना हम 2016 का हर दिन ऐसे जिएं जैसे ये हमारी ज़िंदगी का पहला और आख़िरी दिन हो..तो इस साल जो करना है कर लो..अपने सपनों को हकीकत में बदलने की रफ्तार तेज कर दो..और अपनी ज़िंदगी को इतनी शिद्दत से जियो कि मैं, आप और हम सब 2016 के हीरो बन जाएं..Anshupriya Prasad

Comments

Popular posts from this blog

खुद को कितना सताओगे?

अपने आप को चाहें धीरे-धीरे मारो या एक बार में..हमारे अंदर ये जो नन्ही सी जान है..बेचारी, उफ तक नहीं करेगी..यही वजह है कि हम जब चाहें तब अपने आपको दुखी करते रहते हैं..और वो भी चुपचाप सब कुछ सहती रहती है..अगर हमें, खुद से थोड़ा सा भी विरोध करना आता..तो हम ये कभी नहीं कर पाते..हैरत की बात है कि इसकी कोई सजा भी नहीं है..लेकिन सच्चाई तो ये है कि अगर दूसरों को सताना जुर्म है..तो खुद को सताना उससे भी बड़ा जुर्म है..इसलिए खुद के साथ नर्मी से पेश आया करो..और दूसरों को खुश रखने के साथ-साथ अपने आपको भी खुश रखना सीखो.. +anshupriya prasad

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..