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गम, अच्छे हैं..


कभी-कभी गम इतने हसीन होते हैं कि हम उन्हें अपने सीने से लगा लेते हैं..फिर तन्हाइयां अच्छी लगने लगती हैं.. और जी करता है कि आंसुओं में डूबकर अपना वजूद मिटा दें..धीरे-धीरे यही दर्द फितरत बन जाता है..और हमें इंसान से ज्यादा गम से मोहब्बत होने लगती है..लेकिन जनाब, ये तो एक अंधी सुरंग है..इसमें जितना आगे बढ़ते जाओगे उतना ही अंधेरा बढ़ता जाएगा..और ज़िंदगी बेकार चली जाएगी..इसलिए मीठे-मीठे दर्द की बेड़ियों को तोड़ना होगा..इसके बाद भले ही ज़िंदगी पहले जैसी ना रह जाए..लेकिन नई शुरुआत होगी तो उसके बेहतर होने की उम्मीद जगेगी..क्योंकि गम चाहें अपनों से मिले या गैरों से..ये हमें ज़िंदगी जीने की नई राह दिखाते हैं..अपने आपको आजमाने का मौका देते हैं..इसलिए गम, अच्छे हैं..जितना तड़पोगे, उतना निखरोगे..और बेहतर इंसान बनोगे...बस, इन्हें आगे बढ़ने का जरिया बनाते चलो... Anshupriya Prasad

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खुद को कितना सताओगे?

अपने आप को चाहें धीरे-धीरे मारो या एक बार में..हमारे अंदर ये जो नन्ही सी जान है..बेचारी, उफ तक नहीं करेगी..यही वजह है कि हम जब चाहें तब अपने आपको दुखी करते रहते हैं..और वो भी चुपचाप सब कुछ सहती रहती है..अगर हमें, खुद से थोड़ा सा भी विरोध करना आता..तो हम ये कभी नहीं कर पाते..हैरत की बात है कि इसकी कोई सजा भी नहीं है..लेकिन सच्चाई तो ये है कि अगर दूसरों को सताना जुर्म है..तो खुद को सताना उससे भी बड़ा जुर्म है..इसलिए खुद के साथ नर्मी से पेश आया करो..और दूसरों को खुश रखने के साथ-साथ अपने आपको भी खुश रखना सीखो.. +anshupriya prasad

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..