Skip to main content

मेरी क़लम को तुम्हारी आदत पड़ चुकी है

आज मौसम ने फिर करवट बदली है..ज़रा सी शाम होते ही, हवाओं में ठंड जैसे घुल सी गई है...ठीक वैसे ही जैसे मेरी ज़िंदगी में तुम घुलमिल से गऐ थे ..तुम्हारा तो पता नहीं ,लेकिन तुम्हारा एहसास हमेशा मेरे साथ रहता है..शाम को जब ऑफिस से निकली, तो ठंडी हवा के थपेड़ों ने मेरे दिल पर दस्तक दे दी..इस ठंड के बीच, तुम्हारे ख्यालों की गर्म चादर लपेटे.. मैं कब घर पहुँच गई पता ही नहीं चला .....
ऐसा नहीं है कि बहुत दिनों से तुम्हें सोचा नहीं ..ऐसा भी नहीं है कि बहुत दिनों से तुम्हारे बारे में कुछ लिखा न हो लेकिन जब भी तुम्हारा ख्याल मेरे दिल और दिमाग से होकर गुज़रता है, ऐसा लगता है, जैसे अंदर कोई कारखाना चलता है, ढेर सारे लफ्ज़ उचक-उचक कर कागज़ पर उतर आने के लिए बावरे हो जाते हैं .., वैसे तो अमूमन मैं हर चीज़ से जुड़ी बातें लिखती हूं अक्सर..लेकिन अपने लिखे को उतनी शिद्दत से महसूस तभी कर पाती हूं , जब काग़ज़ पर तुम्हारी तस्वीर उभर कर आ जाती है, गोया मेरी क़लम को भी तुम्हारी आदत पड़ चुकी है ...ज़रीन की कलम से

Comments

Popular posts from this blog

खुद को कितना सताओगे?

अपने आप को चाहें धीरे-धीरे मारो या एक बार में..हमारे अंदर ये जो नन्ही सी जान है..बेचारी, उफ तक नहीं करेगी..यही वजह है कि हम जब चाहें तब अपने आपको दुखी करते रहते हैं..और वो भी चुपचाप सब कुछ सहती रहती है..अगर हमें, खुद से थोड़ा सा भी विरोध करना आता..तो हम ये कभी नहीं कर पाते..हैरत की बात है कि इसकी कोई सजा भी नहीं है..लेकिन सच्चाई तो ये है कि अगर दूसरों को सताना जुर्म है..तो खुद को सताना उससे भी बड़ा जुर्म है..इसलिए खुद के साथ नर्मी से पेश आया करो..और दूसरों को खुश रखने के साथ-साथ अपने आपको भी खुश रखना सीखो.. +anshupriya prasad

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..