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किसी भी उम्र में ज़िंदगी सुधर जाए तो क्या बुरा है..

ऐसा क्यों होता है कि सारी परेशानियां घूम फिर के हमारे ही गले पड़ जाती हैं...किसी और की गलती के लिए भी हमें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है...जिन बातों पर दूसरों का बाल भी बांका नहीं होता उसी बात के लिए हमारी ज़िंदगी नर्क बना दी जाती है...जब भी हमारे साथ कुछ बुरा होता है तो हमें लगता है कि मैं ही क्यों..बाकी लोग तो इतने सुखी हैं..फिर सारे दुख मुझे ही क्यों मिल रहे हैं...ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम लगातार दुख और परेशानी को अपनी तरफ खींचते रहते हैं...हम जैसा सोचते हैं..और करते हैं...उसी तरह की चीजें हमारी तरफ आकर्षित होती हैं...अगर हम अच्छा (पॉज़िटिव) सोचेंगे तो हमारे आसपास का माहौल बेहतर होगा..और हमारे लिए लोगों का रवैया बदलने लगेगा..लेकिन अगर हम बुरा (निगेटिव) सोचेंगे तो गलत लोगों से घिर जाएंगे...और निगेटिविटी चाहें वो अपने लिए हो या दूसरे के लिए..उससे सिर्फ दुख मिल सकता है, सुख नहीं...इसलिए खुश रहो, अच्छा सोचो और हौसला बनाए रखो..हम जितनी ईमानदारी से इसे अपनी ज़िंदगी में उतारेंगे..रिज़ल्ट भी उतनी ही जल्दी मिलेगा...वैसे किसी भी उम्र में ज़िंदगी सुधर जाए तो क्या बुरा है..कम से कम उसे सुधारने की शुरुआत तो हो... Anshupriya Prasad

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खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

मेरी मां

जब पापा डांटते हैं गलतियों पर...तब प्यार से गले लगाती है माँ.. अपने पेट को काट कर हमें एक रोटी ज्यादा खिलाती वो निस्वार्थ अन्नदात्री है मेरी माँ.. अगर गिर जाऊं कहीं या लड़खड़ा जाऊं अंधेरों में..तो फिर से उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाती है मेरी माँ...