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खुशियों की नींव पर ही एक अच्छी ज़िंदगी की इमारत खड़ी हो सकती है

तुम्हारे चेहरे पर जो उदासी की परत जम गई है..मन करता है उसे अपनी हथेली से पोछ कर मिटा दूं..तुम्हारी आंखों में तैरते जिस दर्द को देखकर मैं सिहर जाती हूं..जी करता है कि वो सारा दर्द अपने आंचल में सोख लूं..जब भी तुम भारी कदमों से चलते दिखाई देते हो...तो दिल करता है कि सारी परेशानियों को बटोर कर इतनी दूर फेंक दूं कि उनका साया भी तुम पर ना पड़े..लेकिन सच तो ये है कि अपने हिस्से के गमों से तुम्हे खुद ही छुटकारा पाना होगा...क्योंकि दूसरा सिर्फ सहानुभूति जता सकता है या रास्ता दिखा सकता है..दुख दूर नहीं कर सकता..वैसे भी हमारे गमों से किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता..ये दुनिया जैसी है वैसी ही रहेगी और इसके लोग भी...इसलिए बेहतर ज़िंदगी के लिए हमें अपने आपको और अपने सोचने के तरीके को बदलना होगा..नहीं तो कुछ ना कुछ मन को सताता ही रहेगा..इसलिए आज से..अभी से..मन को शांत करो और खुश रहने की शुरुआत करो...क्योंकि खुशियों की नींव पर ही एक अच्छी ज़िंदगी की इमारत खड़ी हो सकती है.. Anshupriya Prasad

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दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..