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अग्नि परीक्षा कितनी बार?

ज़िंदगी भी बड़ी अजीब है..जो चाहिए वो मिलता नहीं और जो नहीं चाहिए वो भर-भर कर मिलता रहता है..कभी-कभी तो हम छोटी से छोटी चीज़ के लिए भी ऐसे तरस जाते हैं जैसे कि उसे पाना फ़लक से चांद-तारे तोड़ने के बराबर हो..बार-बार ऐसा होने पर निराश मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ऐसी चीज़ें तो दूसरों को बिना मांगे ही मिल जाती हैं फिर हमें क्यों हर बार अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है..क्या हमारे नसीब में इतनी छोटी सी चीज़ भी नहीं है..ऐसा नहीं है..अगर हमारा आज ख़राब है तब भी हमें कल के अच्छे होने की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए..क्योंकि जब हम रोजमर्रा की परेशानियों में उलझे रह जाते हैं तो जीवन की हर खुशी पीछे छूटने लगती है..इसलिए हर चीज़ पर झुंझलाने, परेशान या दुखी होने की ज़रूरत नहीं है..कुछ चीज़ें समय के साथ अपने आप ठीक हो जाती हैं..और जो नहीं होती हैं उनको ठीक करने के लिए हमारा हौसला और उम्मीद ही काफ़ी है.. +anshupriya prasad 

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दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..