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जब भी मन बुझने लगे..


 जब कोई बात ही नहीं थी..तो क्यों हुईं आंखें नम..क्यों उठी दिल में टीस..और क्यों छाई चेहरे पर उदासी..कुछ तो है..भले ही आसमान नहीं टूटा है..लेकिन दिल में, ज़रूर कुछ टूटा है..

जब भी मन बुझने लगे..और हौसले पस्त पड़ने लगें..तब मजबूती से खड़े रहना..दुख-तकलीफ पूरी ताकत से अपनी ओर खींचेगे..लेकिन, फौलादी इरादों के साथ डटे रहना..कितने भी आंसू निकलें..कितना भी दिल भारी हो..उस तरफ बिल्कुल नहीं जाना..क्योेंकि, हालात से लड़ाई तो बाद में होगी..पहले अपने मन से तो निपट लें..

वो कहते हैं ना 'मन के हारे, हार है..और मन के जीते, जीत'..इसलिए जब भी उदासी छाए तो अपना ध्यान कहीं और लगा लेना..आसान नहीं होगा ऐसा करना..लेकिन, अगर हम लगातार 21 दिनों तक, एक पल के लिए भी, उदासी को अपने पास नहीं फटकने देंगे..तो दर्द का चक्रव्यूह, अपने आप ही टूट जाएगा..

अब देखो ना..कोरोना ने पहले ही हम सबकी ज़िंदगी उलट-पलट दी है..ऐसे में अगर मन भी हार गया, तो जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा..इसलिए खुश रहें..और हौसला बनाए रखें..सूरज में अगर ग्रहण लग भी जाए, तो क्या गम है?..मन के उजियारे ही काफी हैं..बाहर के अंधियारे मिटाने के लिए..

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खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

सरल और सहज होना अभिशाप नहीं..

दुनिया बुरी है, तो हम क्यों अच्छे बनें?..ज़माना तो चालू लोगों का है, तो फिर हमें, सीधे-साधे बनकर क्या मिलेगा?..दुनियादारी तो यही सिखाती है कि जो जैसा हो, उसके साथ वैसा ही करो..लेकिन अगर आपके अंदर, ऐसी दुनियादारी नहीं है, तो भूलकर भी उसे सीखने की कोशिश नहीं करना..इसलिए नहीं कि बुरे के बदले, बुरा नहीं करना चाहिए..बल्कि इसलिए कि लाख चाहने पर भी आप, दूसरों जितना नीचे, नहीं गिर पाओगे..गुस्सा आएगा, लेकिन किसी का गला पकड़ने में हाथ कांपेंगे..तड़पोगे, कलपोगे, लेकिन दूसरे का दिल दुखाने से पहले ही पिघल जाओगे..अगर मन कड़ा करके दूसरों जैसा बनने की कोशिश भी की, तो अंदर ही अंदर कुछ मर जाएगा..फिर कैसे झेलोगे अपने सीने में, मुर्दा दिल का बोझ?..अगर कुछ लोग छल-कपट से दूसरों को नीचे गिराकर आगे बढ़ते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं है कि इस दुनिया में सच्चे लोगों के लिए जगह नहीं है..अगर जीने के लिए वाकई इन चीजों की ज़रूरत होती तो हम सबको शरीर के साथ-साथ कपटी और धूर्त होने का भी वरदान मिलता..लेकिन ऐसा नहीं है..इसका मतलब ये है कि सरल और सहज होना अभिशाप नहीं है..हम सब अलग-अलग हैं..और जैसे हैं, बहुत अच्छे हैं..