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सरल और सहज होना अभिशाप नहीं..

दुनिया बुरी है, तो हम क्यों अच्छे बनें?..ज़माना तो चालू लोगों का है, तो फिर हमें, सीधे-साधे बनकर क्या मिलेगा?..दुनियादारी तो यही सिखाती है कि जो जैसा हो, उसके साथ वैसा ही करो..लेकिन अगर आपके अंदर, ऐसी दुनियादारी नहीं है, तो भूलकर भी उसे सीखने की कोशिश नहीं करना..इसलिए नहीं कि बुरे के बदले, बुरा नहीं करना चाहिए..बल्कि इसलिए कि लाख चाहने पर भी आप, दूसरों जितना नीचे, नहीं गिर पाओगे..गुस्सा आएगा, लेकिन किसी का गला पकड़ने में हाथ कांपेंगे..तड़पोगे, कलपोगे, लेकिन दूसरे का दिल दुखाने से पहले ही पिघल जाओगे..अगर मन कड़ा करके दूसरों जैसा बनने की कोशिश भी की, तो अंदर ही अंदर कुछ मर जाएगा..फिर कैसे झेलोगे अपने सीने में, मुर्दा दिल का बोझ?..अगर कुछ लोग छल-कपट से दूसरों को नीचे गिराकर आगे बढ़ते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं है कि इस दुनिया में सच्चे लोगों के लिए जगह नहीं है..अगर जीने के लिए वाकई इन चीजों की ज़रूरत होती तो हम सबको शरीर के साथ-साथ कपटी और धूर्त होने का भी वरदान मिलता..लेकिन ऐसा नहीं है..इसका मतलब ये है कि सरल और सहज होना अभिशाप नहीं है..हम सब अलग-अलग हैं..और जैसे हैं, बहुत अच्छे हैं..
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जीत को किस्मत में उतार लो..

कमाल की काबलियत मिली है इंसान को..जिधर ध्यान लगाओगे, वही होने लगेगा..जिस तरफ दिमाग चलाओगे, उसी में अच्छा कर लोगे..और जिस काम में 100% दोगे, वही सधने लगेगा..तो फिर ऐसा क्या है, जो हम कर नहीं सकते..ठान लेंगे, तो एक ना एक दिन हो ही जाएगा..लगन, मेहनत और यकीन..ये 3 मंत्र हैं, जो किसी भी इंसान को सफल बनाते हैं..तो क्यों ना इस बार हम खुद ही ये चमत्कार करें..और सबसे पहले वो कर दिखाएं, जो हमारे लिए सबसे कठिन है..जब एक मुश्किल काम सध जाता है, तो दुनिया की तमाम मुश्किलात छोटी लगने लगती हैं..इसलिए, चुनौतियों को इतना ललकारो कि हार का डर ही खत्म हो जाए..और जीतना, इत्तफाक (by chance) नहीं, किस्मत बन जाए..

आधे-अधूरे क्यों जीना..

ये बैचेनी..ये कसक..उन सपनों की है जो अधूरे छूट गए, या फिर कभी देखे ही नहीं गए..जब हम बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन करते नहीं, तो दिल बैचेन हो उठता है..कहीं मन नहीं लगता..समझ में नहीं आता कि क्या करें..फिर भले ही हम इधर-उधर की चीजों में, लाख टाइम पास करने की कोशिश करें..लेकिन ये दिल, ज्यादा देर तक बहलेगा नहीं..टीवी, फेसबुक, व्हाट्सएप, नशा, नींद, गॉसिप, पार्टी, किसी से भी खालीपन नहीं भरेगा..क्योंकि हमारे अंदर कुछ है, जो लगातार संपूर्ण होना (Perfection) चाहता है..यानी कि हर काम पहले से बेहतर करना चाहता है..जिसे अपनी सीमाओं से परे, एक नई पहचान की तलाश है..और जो खिल कर, महकना चाहता है..लेकिन हम उसे, उसके हिस्से की धूप नहीं देते..उसे मन के अंधेरों में बंद करके भूल गए हैं..इसलिए इतनी पीड़ा, इतनी बैचेनी होती है..अगर इससे निकलना है तो अपने गोल (Goal) सेट करो..रोज़मर्रा के काम से हटकर, अपना लक्ष्य बनाओ..कुछ नया सीखो..किसी मुश्किल काम को साधो..फिर देखो, कितना मज़ा आता है..सारी खलिश, सारी बैचेनी एकदम खत्म हो जाएगी..एक ऐसी पाकीज़ा खुशी मिलेगी..जिसे कोई, आपसे छीन नहीं पाएगा..तो फिर, आधे-अधूरे क्यों …

गिरने में शरम कैसी?

मेहनत, सफलता की गारंटी नहीं है..संघर्ष, मंज़िल पाने का टिकट नहीं है..बार-बार फेल होगे..बार-बार गिरोगे..हो सकता है कि लक्ष्य भी मिलते-मिलते रह जाए..लेकिन घबराना नहीं..कोशिश करते रहना..क्योंकि मेहनत का कोई और विकल्प नहीं है..सभी कामयाब लोग यही करते हैं..और ज़िंदगी भर करते हैं..पहले तो मंज़िल तक पहुंचने के लिए और फिर उस पर टिके रहने के लिए लगातार मशक्कत करनी पड़ती है..वैसे भी फेल, हमारी प्लानिंग होती है..हम नहीं..इसलिए गिरने से क्या डरना..बढ़े चलो, जब तक है जान..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..

एक बार जो कमिटमेंट कर दी..

हम सपने देखने से डरते हैं..उनके बारे में बात करने में संकोच करते हैं..घबराते हैं कि अगर किसी को पता चल गया तो हमारा मज़ाक उड़ेगा..लोग कहेंगे कि आता-जाता तो कुछ नहीं है लेकिन ख्वाब तो राजा-रानियों वाले हैं..सच तो ये है कि हम दूसरों से नहीं बल्कि अपने आप से शरमाते हैं..खुद से कमिटमेंट करने में डरते हैं..अब लोगों का क्या है..उन्हे तो कुछ ना कुछ कहना ही है..सपने देखोगे, तब भी बोलेंगे और नहीं देखोगे, तब भी ताने मारेंगे कि ये तो किसी लायक नहीं है..इसलिए सपने ज़रूर देखो..अपनी ताकत से ज्यादा और खूब सारे देखो..फिर अपने आपको उनमें झोंक दो..सलमान ख़ान का ये डायलॉग तो सुना ही होगा कि-"एक बार जो मैंने कमिटमेंट कर दी..उसके बाद तो मैं खुद की भी नहीं सुनता"..ऐसी ही कमिटमेंट खुद से करो..अपनी तरक्की के लिए..उन्नति के लिए..अपने और अपनों के सपने साकार करने के लिए..और फिर जब तक मंज़िल पर नहीं पहुंचो तब तक खुद की भी नहीं सुनो..