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Showing posts from March, 2016

अपने इश्क विच रंग दे..

ऐसी रंगी हूं तुम्हारे रंग में कि अपनी पहचान खो बैठी..

ये होली, सच्ची मोहब्बत के नाम

वो होली ही क्या जिसमें मोहब्बत के रंग ना हों..वो गुलाल ही क्या जो किसी अपने के चेहरे पर ना लगे..और वो पिचकारी ही क्या जो पिया का तन-मन ना भिगोए..इश्क में गुजारा एक-एक पल बेशकीमती है क्योंकि सिर्फ प्यार ही ज़िंदगी को जीने लायक बनाता है..तो ये होली, सच्ची मोहब्बत के नाम..लेकिन इश्क दुआ है जुनून नहीं..इसलिए किसी को भी उसकी औकात से ज्यादा मत चाहो..आपका प्यार अनमोल है उसे ऐसे इंसान के लिए बचाकर रखो..जो आपकी कीमत समझे और प्यार के साथ-साथ सम्मान भी दे..मोहब्बत के इन्ही असली रंगों के साथ आप सभी को होली मुबारक.. Anshupriya Prasad

'Straight through my heart'

'लड़की अंखियों से  गोली मारे...'

पिता-पुत्र का संग्राम

आज तो पापा को हरा कर ही छोड़ूंगा..



खुशियों की नींव पर ही एक अच्छी ज़िंदगी की इमारत खड़ी हो सकती है

तुम्हारे चेहरे पर जो उदासी की परत जम गई है..मन करता है उसे अपनी हथेली से पोछ कर मिटा दूं..तुम्हारी आंखों में तैरते जिस दर्द को देखकर मैं सिहर जाती हूं..जी करता है कि वो सारा दर्द अपने आंचल में सोख लूं..जब भी तुम भारी कदमों से चलते दिखाई देते हो...तो दिल करता है कि सारी परेशानियों को बटोर कर इतनी दूर फेंक दूं कि उनका साया भी तुम पर ना पड़े..लेकिन सच तो ये है कि अपने हिस्से के गमों से तुम्हे खुद ही छुटकारा पाना होगा...क्योंकि दूसरा सिर्फ सहानुभूति जता सकता है या रास्ता दिखा सकता है..दुख दूर नहीं कर सकता..वैसे भी हमारे गमों से किसी को कोई खास फर्क नहीं पड़ता..ये दुनिया जैसी है वैसी ही रहेगी और इसके लोग भी...इसलिए बेहतर ज़िंदगी के लिए हमें अपने आपको और अपने सोचने के तरीके को बदलना होगा..नहीं तो कुछ ना कुछ मन को सताता ही रहेगा..इसलिए आज से..अभी से..मन को शांत करो और खुश रहने की शुरुआत करो...क्योंकि खुशियों की नींव पर ही एक अच्छी ज़िंदगी की इमारत खड़ी हो सकती है.. Anshupriya Prasad

क्या गारंटी है कि किस्मत खराब भी होती है?

क्या हमारी ज़िंदगी में सब कुछ पहले से तय है..हम कुछ नहीं कर सकते...अगर ऐसा होता तो हमें अपना रास्ता चुनने की आज़ादी नहीं होती...किसी भी हालात में हम कैसे रियेक्ट करें, ये हमारे ऊपर है...हम किसी भी चीज को इतना खराब कर सकते हैं कि कोई उम्मीद ही ना रहे और इतना अच्छा भी कर सकते हैं कि मंज़िल साफ-साफ दिखाई देने लगे...हर इंसान में इतनी ताकत है कि वो अपना भाग्य खुद बना सके...वैसे भी इस बात की क्या गारंटी है कि किस्मत खराब भी होती है...कोई आकाशवाणी तो हुई नहीं आज तक...दो-चार बार हार का मुंह क्या देख लिया खुद से, खुदाई से खफ़ा हो गए...जब हर समय बुझे-बुझे रहोगे...कोशिश ही नहीं करोगे...तो आगे कैसे बढ़़ोगे...ज़मीन में ऐसे उगो कि तूफान भी हिला नहीं सके...क्योंकि असफलता मिलती ही इसलिए है कि उन चीज़ों को पाने का मज़ा बढ़ जाए जो उम्मीद से भी ज्यादा खूबसूरत हैं...इसलिए रुकना नहीं...अपने दमखम से वो हासिल करो जिस पर हमारा नाम उसी दिन लिख दिया गया था जिस दिन हमने उन्हें पाने का ख्वाब देखा था... Anshupriya Prasad

'आ लेकर चलूं तुझे ऐसे गगन के तले..'

मन खुश हो तो रिक्शे की सवारी भी खुशियों की सवारी बन जाती है..

सोने की गुड़िया

गोल्डन सोफे पर बैठ कर खूब इठलाए लाडो रानी..

जब जन्मदिन 4 साल में एक बार आए

मेरे 12 साल की उम्र वाले राखी भाई और हमारा परिवार...
                                                       भाई के जन्मदिन का जबरदस्त जश्न

मासूम सी कश्मकश

ये तो इतना ऊंचा है...मैं इस पर कैसे चढूं???

पंगा नहीं लेने का..

बस, बहुत हो गया...अब एक शब्द भी और नहीं...

किसी भी उम्र में ज़िंदगी सुधर जाए तो क्या बुरा है..

ऐसा क्यों होता है कि सारी परेशानियां घूम फिर के हमारे ही गले पड़ जाती हैं...किसी और की गलती के लिए भी हमें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है...जिन बातों पर दूसरों का बाल भी बांका नहीं होता उसी बात के लिए हमारी ज़िंदगी नर्क बना दी जाती है...जब भी हमारे साथ कुछ बुरा होता है तो हमें लगता है कि मैं ही क्यों..बाकी लोग तो इतने सुखी हैं..फिर सारे दुख मुझे ही क्यों मिल रहे हैं...ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम लगातार दुख और परेशानी को अपनी तरफ खींचते रहते हैं...हम जैसा सोचते हैं..और करते हैं...उसी तरह की चीजें हमारी तरफ आकर्षित होती हैं...अगर हम अच्छा (पॉज़िटिव) सोचेंगे तो हमारे आसपास का माहौल बेहतर होगा..और हमारे लिए लोगों का रवैया बदलने लगेगा..लेकिन अगर हम बुरा (निगेटिव) सोचेंगे तो गलत लोगों से घिर जाएंगे...और निगेटिविटी चाहें वो अपने लिए हो या दूसरे के लिए..उससे सिर्फ दुख मिल सकता है, सुख नहीं...इसलिए खुश रहो, अच्छा सोचो और हौसला बनाए रखो..हम जितनी ईमानदारी से इसे अपनी ज़िंदगी में उतारेंगे..रिज़ल्ट भी उतनी ही जल्दी मिलेगा...वैसे किसी भी उम्र में ज़िंदगी सुधर जाए तो क्या बुरा है..कम …

जब बौनी लगे दुनिया..

इन पेड़ों से भी ऊंची हस्ती है मेरी..जो मिटाए ना मिटे..झुकाए ना झुके...

देखो, कितना शैतान है..

कौन है ज्यादा शैतान? 
                                        गाल खींचने वाला या फिर गाल खींचने पर हंसने वाला

ज़मीन पर उतरी परी

पापा, देखो मैं परी बन गई..

गमों की क्या औकात?

ज़िंदगी जीने के दो ही तरीके हैं..पहला..ऊपरवाले पर सबकुछ छोड़ दो और निश्चिंत हो जाओ...किस्मत जो भी दे, उसे खुशी-खुशी स्वीकारो..अच्छा मिले तो बढ़िया..नहीं मिले तो कड़वा घूंट समझ कर पी जाओ...दूसरा..जीतोड़ मेहनत करो और अपना भाग्य खुद बनाओ...दोनों में से कोई भी तरीका अच्छा या बुरा नहीं है...ये हमारे ऊपर है कि हम कौनसा तरीका चुनते हैं...लेकिन इतना तो तय है कि दोनों ही तरीकों में चिंता, परेशानी, गम की कोई जगह नहीं है...अगर हम खुदा के भरोसे हैं तो वो बिना मांगे हम पर अपनी नेमत बरसाएंगे...और सारे दुख हर लेंगे...और अगर आप खुद ही ज़िंदगी से जूझने निकल पड़े हैं तब भी घबराने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आत्मविश्वास के सामने गमों की क्या औकात...तो फिर शिकायत किस बात की...एक बेहतर कल की उम्मीद में हमेशा हंसते-मुस्कुराते रहो...और ज़िंदगी को जी भर के जियो... Anshupriya Prasad

मेरे घर आई एक नन्ही परी

जबसे खुली हैं आंखें..गुड़िया टुकुर-टुकुर ताके..

रंग-बिरंगा ऑटो

जयपुर की गलियों में घूमें दो-दो चुलबुल पांडे..

एक हसीन ख्वाब जब हकीकत में बदल जाए

मोहब्बत का आगाज़ ऐसा है तो अंजाम क्या होगा?

मेरी क़लम को तुम्हारी आदत पड़ चुकी है

आज मौसम ने फिर करवट बदली है..ज़रा सी शाम होते ही, हवाओं में ठंड जैसे घुल सी गई है...ठीक वैसे ही जैसे मेरी ज़िंदगी में तुम घुलमिल से गऐ थे ..तुम्हारा तो पता नहीं ,लेकिन तुम्हारा एहसास हमेशा मेरे साथ रहता है..शाम को जब ऑफिस से निकली, तो ठंडी हवा के थपेड़ों ने मेरे दिल पर दस्तक दे दी..इस ठंड के बीच, तुम्हारे ख्यालों की गर्म चादर लपेटे.. मैं कब घर पहुँच गई पता ही नहीं चला .....
ऐसा नहीं है कि बहुत दिनों से तुम्हें सोचा नहीं ..ऐसा भी नहीं है कि बहुत दिनों से तुम्हारे बारे में कुछ लिखा न हो लेकिन जब भी तुम्हारा ख्याल मेरे दिल और दिमाग से होकर गुज़रता है, ऐसा लगता है, जैसे अंदर कोई कारखाना चलता है, ढेर सारे लफ्ज़ उचक-उचक कर कागज़ पर उतर आने के लिए बावरे हो जाते हैं .., वैसे तो अमूमन मैं हर चीज़ से जुड़ी बातें लिखती हूं अक्सर..लेकिन अपने लिखे को उतनी शिद्दत से महसूस तभी कर पाती हूं , जब काग़ज़ पर तुम्हारी तस्वीर उभर कर आ जाती है, गोया मेरी क़लम को भी तुम्हारी आदत पड़ चुकी है ...ज़रीन की कलम से

समझते भी हो कि मज़हब क्या है?

छाती ठोककर अपने-अपने मज़हब का ढोल पीटते हो...समझते भी हो कि मज़हब क्या है...ज़रा-ज़रा सी बात पर लड़ने को तैयार हो जाते हो..जानते भी हो कि इसका अंजाम कितना भयानक होगा...बस, कोई बोल भर दे..ये लो जी..किसे काटना है बताओ...तलवार से ना सही..ज़ुबान कौन सी कम है...उसके ज़हर बुझे तीर तो सीधा दिल के आर-पार हो जाते हैं...इतनी नफ़रत धधक रही है सीने में कि खुद को कुछ मिले या ना मिले...दूसरे को कुछ नहीं मिलना चाहिए...अपने मज़हब से काम की एक बात नहीं सीखना..लेकिन दूसरों के मज़हब पर कीचड़ उछालना मत भूलना..सारी ज़िंदगी चाहें किल्लत और धक्के खाने में निकल जाए लेकिन धर्म के नाम पर अपने पैर इतने पसारो कि दूसरे का आंचल मैला हो जाए...अगर ऐसा नहीं करोगे तो राजनीति की रोटियां कैसे सिकेंगी...फिर चाहें अपने घर में रोटी हो या ना हो...वैसे भी मां के आंसुओं और बिलखते बच्चों की परवाह किसे है...पहले एक-दूसरे का खून तो पी लें..तो चलो, क्यों ना इस ज़िंदगी को धर्म की झूठी शान पर कुर्बान कर दें...धरती को तो स्वर्ग बना नहीं सके...जन्नत को ज़रूर नर्क बना देंगे.. Anshupriya Prasad