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ज़रा सी ज़िंदगी...

                                
अजीब सी कश्मकश है तू ज़िंदगी....
पता ही नहीं तू जीना सिखा रही है या जीते जी मेरा मज़ाक बना रही है....
कभी तू मीठा गाजर का हलवा बन कर जीवन मीठा कर जाती है..
और फिर तू केले का छिलका बन कर, बीच सड़क में गिरा जाती है...
कभी तू 3G की स्पीड सी, स्मूथ दौड़ जाती है,
और फिर अचानक स्लो कनेक्टिविटी सी तू हैंग कर जाती है...
कभी तू एयर बलून पहना कर मुझे बहुत ऊपर ले जाती है,
और फिर तू बंजी जंपिंग कर सीधे गड्ढे में गिराती है,
कभी तो तू फ्लिपकार्ट की सर्विस बन दरवाजे पे खुशियां पहुंचा जाती है..
और फिर तू CP के पालिका बाज़ार में, नकली सामान दिलवा कर ठग सा जाती है...
कभी तू कॉमेडी नाइट का कपिल बन कर गुदगुदाती है...
और फिर अचानक तू एंग्री अमिताभ बन कर सीरियस मोड़ में पहुंचा जाती है....
कभी तू मोदी का जोशीला भाषण सी जोश भर जाती है,
और फिर तू मनमोहन की ख़ामोशी सा चुप कर जाती है...
अजीब सी कश्मकश है तू ज़िंदगी....
पता ही नहीं तू जीना सिखा रही है या जीते जी मेरा मज़ाक बना रही है....
 zindaginama#  ज़रीन की कलम से...

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खुशियों की तैयारी..

अपने आप से बात करते समय, बेहद सावधानी बरतें..क्योंकि हमारा आगे आने वाला वक्त काफी हद तक, इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या सोचते हैं..या फिर खुद से कैसी बातें करते हैं..हमारे साथ कोई भी बात, होती तो एक बार है, लेकिन हम लगातार उसी के बारे में सोचते रहते हैं..और मन ही मन, उन्ही पलों को, हर समय जीते रहते हैं जिनसे हमें चोट पहुंचती है..बार-बार ऐसी बातों को याद करने से, हमारा दिल इतना छलनी हो जाता है कि सारा आत्मविश्वास, रिस-रिस कर बह जाता है..फिर हमें कोई भी काम करने में डर लगता है..भरोसा ही नहीं होता कि हम कुछ, कर भी पाएंगे या नहीं..तरह-तरह की आशंकाएं सताने लगती हैं..इन सबका नतीजा ये होता है कि अगर कोई अनहोनी, नहीं भी होने वाली होती है, तो वो होने लगती है..गलत बातें सोच-सोच कर, हम अपने ही दुर्भाग्य पर मोहर लगा देते हैं..इसलिए वही सोचो, जो आप भविष्य में होते हुए देखना चाहते हो..वैसे भी न्यौता, सुख को दिया जाता है..दुख को नहीं..तो फिर तैयारी भी खुशियों की ही करनी चाहिए..

दर्द भरा नूर..

मोहब्बत करने वाले रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरा करते हैं..क्योंकि किसी और को अपना हिस्सा बनाने के लिए खुद को मिटाना पड़ता है..तभी दूसरे के लिए जगह बनती है..अपना वजूद जितना मिटेगा, उतना ही प्यार बढ़ता चला जाएगा..ज़रूरी नहीं है कि जितनी प्रीत आप कर सकते हो, उतनी वापस भी मिल जाए..क्योंकि प्रेम तो केवल वही निभा सकते हैं जिन्हें दर्द के नूर में तप-तप कर संवरना आता है..प्रेमी अगर मिल जाएं तो 'राधा-कृष्ण'..और ना मिल पाएं तो 'मीरा-कृष्ण'..

मेरी मां

जब पापा डांटते हैं गलतियों पर...तब प्यार से गले लगाती है माँ.. अपने पेट को काट कर हमें एक रोटी ज्यादा खिलाती वो निस्वार्थ अन्नदात्री है मेरी माँ.. अगर गिर जाऊं कहीं या लड़खड़ा जाऊं अंधेरों में..तो फिर से उंगली पकड़कर मुझे चलना सिखाती है मेरी माँ...